परिवर्तन की साक्षी

संघर्षों के भंवर में, सपनो की झुलसती कहानी की साक्षी, अरमानो की खुली पोटली से, खुशियों के गायब हो जाने की साक्षी, कभी सिसकती, कभी सहमती, कुछ बेचैन सी साँसों की साक्षी, मद्धम होती सूरज…

माँ

लेखनी बहुत लिखी, प्रेम की भाषा भी थोड़ी बहुत सीखी, लेकिन आज माँ की शिकायत सुनी, सबके बारे में लिखती हो, मुझे क्यूँ अपनी कविता में अपीरिचित रखती हो, मैं मुस्काई, थोड़ा शब्दों की गहराई…

ध्यान पीड़ा का या प्रभु का – प्रसंग

धरा पर जन्म लिया तो प्रभु से एक अनुपम उपहार पाया, अनेक क्षमताओं से परिपूर्ण यह नरतन पाया, धीरे धीरे दुनियाँ के झमेले में रमता गया, कुछ और, थोड़ा और पाने की लालसा में शरीर…

परिवर्तन

जीवन के अन्नन्त प्रवाह में, धूंदले से आसमान तले, हर दिन की दौड़ धूप में, ना जाने कितने सपनो को पनपते देखा है… हाँ, मैने परिवर्तन को एक भयंकर रूप लेते देखा है..! कभी करवट…

विरक्त

बंधन में बाँधु तुम्हे, या स्वयं ही मुक्त हो जाऊँ, उन्मुक्त सी होकर आकाश में उड़ूँ, और जीवन से मैं विरक्त हो जाऊँ, कुछ खोने और पाने की कशमकश से दूर, इस तन्हा सी भीड़…

बाबुल

बाबुल तुम्हारे पहलू में बैठकर एक ज़िंदगी और जी लेने को मन करता है.. तुम्हारे घर की दहलीज़ को छोड़ने से पहले, इस आँगन में फिर से खेलने को मन करता है.. माँ की लोरियाँ…

बंधन में ना बांधो मुझे

बंधन में ना बांधो मुझे, आज़ाद ही रहने दो.. धरा से दूर उस आकाश में, उन्मुक्त सा होकर उड़ने दो.. अभी अभी तो पंख फैलाना सीखा है मैने, थोड़ी लंबी उड़ान भरने दो, थक भी…

प्रतिबिंब

कभी कभी सोचती हूँ, मैं भी तुम जैसी हो जाऊँ… तुम्हारा प्रतिरूप ना सही, तुम्हारा प्रतिबिंब ही बन जाऊँ… निर्मोही तुम सी ना सही, तन्हा रास्तों पर चलना सीख जाऊँ, जब भी तड़फ़ उठे दिल…

निशब्द

ज़िंदगी की दहलीज़ पे, निशब्द सी खड़ी मैं, अपनी पहचान को तराशते हुए, कुछ अपनो के चेहरों पे, खोई मुस्कुराहट के मोती सजाए… चंद अरमानो की दास्तान, और कुछ उम्मीदों का काफिला पिरोए, हल्की सी…

I took several years to grow…

I was tiny… growing in the womb of my loving mother I was protected in the warmth of love Still, I was curious to come out… To see the world… and to cherish the vibrance……