ध्यान पीड़ा का या प्रभु का – प्रसंग

धरा पर जन्म लिया तो प्रभु से एक अनुपम उपहार पाया, अनेक क्षमताओं से परिपूर्ण यह नरतन पाया, धीरे धीरे दुनियाँ के झमेले में रमता गया, कुछ और, थोड़ा और पाने की लालसा में शरीर…

विरक्त

बंधन में बाँधु तुम्हे, या स्वयं ही मुक्त हो जाऊँ, उन्मुक्त सी होकर आकाश में उड़ूँ, और जीवन से मैं विरक्त हो जाऊँ, कुछ खोने और पाने की कशमकश से दूर, इस तन्हा सी भीड़…

बाबुल

बाबुल तुम्हारे पहलू में बैठकर एक ज़िंदगी और जी लेने को मन करता है.. तुम्हारे घर की दहलीज़ को छोड़ने से पहले, इस आँगन में फिर से खेलने को मन करता है.. माँ की लोरियाँ…

बंधन में ना बांधो मुझे

बंधन में ना बांधो मुझे, आज़ाद ही रहने दो.. धरा से दूर उस आकाश में, उन्मुक्त सा होकर उड़ने दो.. अभी अभी तो पंख फैलाना सीखा है मैने, थोड़ी लंबी उड़ान भरने दो, थक भी…

प्रतिबिंब

कभी कभी सोचती हूँ, मैं भी तुम जैसी हो जाऊँ… तुम्हारा प्रतिरूप ना सही, तुम्हारा प्रतिबिंब ही बन जाऊँ… निर्मोही तुम सी ना सही, तन्हा रास्तों पर चलना सीख जाऊँ, जब भी तड़फ़ उठे दिल…

निशब्द

ज़िंदगी की दहलीज़ पे, निशब्द सी खड़ी मैं, अपनी पहचान को तराशते हुए, कुछ अपनो के चेहरों पे, खोई मुस्कुराहट के मोती सजाए… चंद अरमानो की दास्तान, और कुछ उम्मीदों का काफिला पिरोए, हल्की सी…

Sinking and Surviving

Thriving to make a difference… Burning to bear all the emotions… Oh! I see… There is a heart… that is still paining inside. Making silence my only companion… And listening to some cries deep inside……

तलाश

अपनो की दुनिया में, अंजान से रास्तों पे.. मंज़िल की तरफ बढ़ता मैं… अनचाही परिस्थियों से, लड़ता, उलझता.. सवालों के घेरे में, कटघरे में खड़ा मैं… समय से पहले… अपने जीवन की परिभाषा को समझता…..