शून्य से शिखर

तन्हा से रास्तों पर,भटकते से कदमों को थामकर,रेत पर चमकती पानी की एक बूंद सा,मैंने देखा एक धुंधला सा सपना,उलझते से ख़यालों सा,सुलझते से सवालों का,एक अनकहा सा कारवाँ,जो थामे रहता था मुझे हर लम्हा,मैंने…

वो कहते हैं

वो कहते हैं की स्त्रियां कभी ज्ञानी न हो पाई, आध्यात्म की पराकाष्ठा को, जन्म मरण की बाधा को न समझ पाई। पर वो ये देखना भूल गए के स्त्रियों के दामन में गृहस्थी का…

परिवर्तन

जीवन के अन्नन्त प्रवाह में, धूंदले से आसमान तले, हर दिन की दौड़ धूप में, ना जाने कितने सपनो को पनपते देखा है… हाँ, मैने परिवर्तन को एक भयंकर रूप लेते देखा है..! कभी करवट…