मैं तिनका एक बेजान-सा,
और तीव्र हवा का प्रवाह तुम,
मैं धारा एक भटकी हुई,
और सागर का ठहराव तुम।
मैं टूटी हुई-सी एक लता,
और वृक्ष का आधार तुम,
मैं बूँद बस बारिश की एक,
और इस धरा का विस्तार तुम।
मैं साक्षी बस कुछ ही पलों की,
और समय से विशाल तुम,
तुम ही यहाँ, तुम ही वहाँ,
और तुम ही यह ब्रह्मांड हो।
मैं शून्य-सी, खोई हुई,
बस तुमसे ही परिपूर्ण हूँ…
सवाल हैं, जवाब हैं,
पर कहने को कुछ भी नहीं,
मैं मौन हूँ, बेख़ौफ़ भी,
बस तेरी रहमत पर खड़ी।
कुछ खो गया, कुछ पा लिया,
संजोने जैसा यहाँ कुछ नहीं,
तेरे होने से जो सुकून है,
उससे तो बढ़कर कुछ नहीं।
तुम आरंभ हो, तुम अंत भी,
तुम आज और अनादि भी,
तुम काल हो, विकराल हो,
और जीवन का प्रवाह भी।
तुम शोर भी, तुम शांति भी,
तुम विश्व की हर क्रांति भी,
तुम शून्य से पहले भी थे,
तुम अनंत के भी साक्षी हो।
तुम आत्मा की यात्रा भी,
तुम ही समय का चक्र हो,
तुम विश्व से पहले भी थे,
और विश्व का विस्तार तुम।
तुम ही जगत का आधार हो,
और जीव का हर विचार तुम…
तुमसे जुड़ी हर बात ही
आनंद का स्रोत है,
तुम स्वयंप्रभा, तुम गोधूलि,
तुम प्राण का संगीत हो।
मैं पपीहा, प्यासा सा,
तुम प्रेम का सागर भी हो,
मैं मिट्टी का कण भी नहीं,
तुम प्रकृति का हर बीज हो।
तुमसे प्रलय, तुमसे जनन,
तुमसे ही जीवन का उदय,
तुम आत्मा का सामर्थ्य हो,
तुम मन का हर विचार भी।
मैं अधूरी-सी एक आस हूँ,
तुम पूर्ण होने की कला,
तुमसे जुड़ा जो तर गया,
तुमसे मिला तो उभर गया।
तुम ही तो मुक्ति का द्वार हो,
और तुम ही बंधन प्रेम का…
तुम प्राण हो, मेरे प्रिय,
तुम श्वास भी इस जीव की,
तुमसे ही हर एहसास है,
तुमसे ही हर अनुबंध भी।
तुम दर्पण-से हो मन में बसे,
तुम ही मेरा श्रृंगार भी,
तुमसे बँधी हर डोर है,
और प्राणों के तुम छोर भी।
तुम ही हो मेरे भाग्य भी,
और तुम ही मेरा कर्म हो,
तुमसे विमुख न मैं रहूँ,
न आत्मा का तल कोई ।
हे कृष्ण, तुम बिन रिक्त हूँ,
तुमसे ही तो मैं पूर्ण भी।
तुम बाँसुरी की धुन में हो,
मैं नाचती-सी एक कली,
तुमसे शुरू है जो सफ़र,
उसकी तो मंज़िल तुमसे ही।
मैं अस्तित्व तुमको सौंपकर,
अब प्रेम में जोगन बनी,
मैं पूर्ण हूँ या अपूर्ण हूँ,
जो भी हूँ, तुमसे ही जुड़ी।
तुम अर्थ भी, तुम अनर्थ भी,
तुमसे ही सृष्टि-चक्र है,
तुम मुस्कुराओ मौन से,
बेसुध-सी मैं जी उठूँ।
मैं तिनका एक बेजान-सा,
और तीव्र हवा का प्रवाह तुम,
मैं धारा एक भटकी हुई,
और सागर का ठहराव तुम।
मैं टूटी हुई-सी एक लता,
और वृक्ष का आधार तुम,
मैं बूँद बस बारिश की एक,
और इस धरा का विस्तार तुम।
मैं साक्षी बस कुछ ही पलों की,
और समय से विशाल तुम,
तुम ही यहाँ, तुम ही वहाँ,
और तुम ही यह ब्रह्मांड हो।
मैं शून्य-सी, खोई हुई,
बस तुमसे ही परिपूर्ण हूँ…
