तन्हा से रास्तों पर,
भटकते से कदमों को थामकर,
रेत पर चमकती पानी की एक बूंद सा,
मैंने देखा एक धुंधला सा सपना,
उलझते से ख़यालों सा,
सुलझते से सवालों का,
एक अनकहा सा कारवाँ,
जो थामे रहता था मुझे हर लम्हा,
मैंने आज उस बंधन को टूटते देखा,
और पंख फैलाकर,
अपने अरमानों को बेखौफ़ उड़ते देखा,
जो मुझमें ही सिमटा था कहीं सहमकर,
आज मैंने उस अस्तित्व को मुक्त होते देखा।
थोड़ा ठहरकर, थोड़ा संभलकर,
टकटकी लगाए मैंने देखा उसकी चाल को,
सब कुछ खोकर जो आनंद मनाए,
उस बेपरवाह अस्तित्व की तान को,
मौज मनाते, रंग जमाते,
जीवन के दिशाहीन उस प्रवाह को,
जिसे मैं समझती थी भटका हुआ,
उसके स्वयं से मिल जाने की चाह को,
हाँ, देर से जाना मैंने,
कि सब कुछ लुटाकर,
अब फ़कीर हो जाने की बारी है,
अब सब शून्य हो गया,
अब शिखर तक चलने की तैयारी है…
जिस राह की कोई मंज़िल हो,
उस पर चलने में आनंद कहाँ,
जो सफ़र हर दिन कम हो जाता हो,
उससे साथ निभाने की उम्मीद कहाँ,
बेतरतीब से, बिखरे से,
बेढंग से रास्ते हों,
और मंज़िल का हाथ थामकर ही,
थोड़ा दूर निकल जाने के इरादे हों,
ज़रा क़रीब से देखें उसके रंगों को,
जो हर दिन मंच पर रख देता है नए खिलौने,
कुछ बेज़ार से, कुछ बेकार से,
और कुछ हर दिन युद्ध के लिए तैयार से,
कभी दूर से देखें खेल उसके,
कभी हिस्सा बन जाएँ उसके नाटक का,
एक पल खोकर, एक पल पाकर,
सब रंगों से रंगकर भी,
बेरंग ही रह जाएँ,
फिर भीतर ही भीतर कहीं,
सब शून्य में मिलाकर,
उसी में, पल भर में,
पूर्ण हो जाएँ।
कुछ जान लेने का,
कुछ भूल जाने का,
और कुछ पा लेने का,
जब अर्थ ही न रह जाए,
शून्य से शिखर के,
हर सफ़र का जब,
भेद ही बदल जाए,
मुक्त हो जाने का,
और बंधन में पड़ जाने का,
कोई मोल ही न रह जाए,
बस हर श्वास में,
एक एहसास ही जीवन का रस बन जाए,
उसी सफ़र को अब हमसफ़र बनाने की तैयारी है,
हाँ, अब सब शून्य हो गया,
अब शिखर तक जाने की बारी है,
जहाँ कोई वजूद ही न हो इस कश्मकश का,
अब उस सफ़र पर चलने की तैयारी है..!

The essence of our struggles are aptly and beautifully summed up. Lovely dear. Keep inspiring!
Beautifully written 💕